Monday, April 27, 2020

चमत्कारी संख्या - 9


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2004 में विज्ञान प्रगति को भेजे लेख की मूल प्रति आज मिल गयी जिसे आपके लिए अपलोड कर रहा हूँ . 

डॉ राजेश कुमार ठाकुर 



Sunday, April 26, 2020

भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जीवन का ‘अनकहा दर्द’- डॉ राजेश कुमार ठाकुर

आज भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की 100वीं पूण्यतिथि (26 अप्रैल 1920) है। अनंत ज्ञाता इस महामानव जिनका प्रादुर्भाव 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास के एक छोटे से गांव इरोड में एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ गणित के तेज से इनसे पहले किसी का नाता ही नहीं रहा था।

लेकिन आज गणित जगत में ऐसा कोई नहीं होगा जो इस महान व्यक्तित्व के संघर्ष गाथा से प्रभावित ना हुआ हो। 10 वर्ष की अल्प अवस्था में स्नातक तक के सभी गणितीय सवालों को स्वयं हल करने वाले, नामगिरी देवी के अनन्य भक्त ने अपने लिए जो स्थान बनाया वो अकल्पनीय है।

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संघर्ष से भरा जीवन

रामानुजन की प्रासंगिकता आज कितनी है ये एक विचारणीय प्रश्न है जिसे समझने से पूर्व मैं भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु की पुस्तक में रामानुजन को लेकर उधृत एक कथन से करता हूँ, “रामानुजन का संक्षिप्त जीवन और मृत्यु उस समय भारत की सामाजिक परिस्थितियों का एक संकेत है , करोड़ों की जनसंख्या वाले इस देश में कितनों को शिक्षा का अवसर मिल पाता है, कितने भुखमरी के कगार पर हैं – यदि परिस्थितियाँ अनुकूल हों और जीवन सब के लिए अपने द्वार खोल सबको खाना , समान शिक्षा और जीवन में बढ़ने के समान अवसर प्रदान करे तो इनमे से कितने ही महान वैज्ञानिक, शिक्षाशास्त्री, इंजीनियर, उद्योगपति, लेखक , कलाकार बनकर नए भारत का निर्माण करने में देश की मदद करेंगे

गणित मे रामानुजन को वही सम्मान प्राप्त है जो भौतिकी के क्षेत्र में आइंस्टीन और न्यूटन को प्राप्त है पर रामानुजन की ओर से प्रशासन ,बौद्धिक समाज का आँखे फेर लेना ; उनके संघर्ष और उपेक्षा का दंश देश की प्रगति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी क्या हम सबको समान शिक्षा, भोजन और समान अवसर दे पायें हैं? शायद आज भी कितने रामानुजन टकटकी लगाये सरकार की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं।

एक साड़ी के दुकान में काम करने वाले गरीब पिता का ये होनहार पुत्र जिनके परिवार को दो वक्त खाना भी ना मिलता हो अगर वो विपरीत परिस्थितियों का सामना कर एक दीप्तमान तारा बन आसमान में सुशोभित हो जाये तो यह निश्चय ही उनकी खुद की लगन और दृढ इच्छाशक्ति का ही परिणाम है।

11वीं में फेल होने के बावजूद नहीं मानी हार

26 अप्रैल 1920 को स्वर्ग सिधारे श्रीनिवास रामानुजन की पुण्य आत्मा आज हमें, देश की सरकारों और व्यवस्था से चीख-चीखकर एक प्रश्न अवश्य पूछ रही है जो 1987 में रामानुजन जन्म शताब्दी समारोह में एक भाषण के दौरान एस रामाशेषन ने पूछा, “भारत में आज कितने रजिस्ट्रार, कितने उपकुलपति आज रामानुजन जैसे असफल ग्यारहवीं फेल शोधार्थी को लाख रूपये प्रतिमाह की छात्रवृति (रामानुजन को उस समय 75रु। की छात्रवृत्ति मिलती थी जो आज के 1 लाख के बराबर है) प्रदान करने का साहस कर सकते हैं या ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय जैसा साहस जो रामानुजन को बी. ए. (आज के पी. एच. डी.) जैसी डिग्री प्रदान कर गौरवान्वित महसूस कर सकती हैं।”

भारत की आजादी के सात दशक बाद हम अंग्रेजी सत्ता को देश की प्रगति के लिए रामानुजन जैसी प्रतिभा को नहीं खोज पाने के लिए दोष नहीं दे सकते। हमें खुद से यह प्रश्न करना आवश्यक है कि क्या रामानुजन के प्रमेय को समझने में 1913 में भारतीय गणितज्ञ असफल रहे कि उन्हें इंग्लैंड के गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी की राह देखनी पड़ी, रामानुजन के शोध को आख़िर विदेशों में ही ख्याति क्यों मिली, क्यों रामानुजन जैसी प्रतिभा को पोर्ट पर 30 रूपये महीने की नौकरी के लिए दर-बदर ठोकर खाने की आवश्यकता पड़ती है?

(प्रोफ़ेसर केन ओनो को रामानुजन पर लिखी किताब भेंट करते हुए)

क्यों उनकी डायरी के लगभग 4000 प्रमेय को सिद्ध करने के लिए उनके मरणोपरांत भी जॉर्ज एंड्रूज और ब्रूस बर्न जैसे अमेरिकी गणितज्ञ की ओर टकटकी लगाने की जरूरत पड़ती है, क्यों रामानुजन के अंतिम दिनों के शोध – मोक थीटा फंक्शन को सही ठहराने के लिए प्रोफ़ेसर केन ओनो की 2012 तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह अवश्य ही विचारणीय प्रश्न है।

गणितज्ञ के प्रति उदासीनता का सवाल

5वीं सदी में आर्यभट्ट से लेकर 13वीं सदी में माधव तक गणित के गौरवमयी इतिहास के बाद के 6 सदियों तक रिक्तता को भरने का श्रेय रामानुजन को मिला। पर उनकी कृति को जो सम्मान मिलना आवश्यक है उसके लिए जब उनकी पत्नी जानकीअम्मल को 50 वर्ष तक अपने पति की कांस्य प्रतिमा का जब इंतजार करना पड़े और अमेरिकी गणितज्ञ के सामूहिक प्रयास से कांस्य प्रतिमा उन्हें उपहार में दिया जाए तो सरकार की उदासीनता दिखती है जो एक गणितज्ञ को समुचित सम्मान नहीं दे पा रही है।

रामानुजन को सच्ची श्रद्धांजलि हम सिर्फ डाक टिकट जारी करके नहीं दे सकते जैसा 1987 या 2012 में हमने किया बल्कि रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लन्दन के पहले फेलो की सच्ची सेवा हम प्रतिभाओं की खोज और उनको निखारने का कार्य निरंतर करके ही कर सकते हैं।

रामानुजन की कहानी सिस्टम की उपेक्षा, गरीबी और मुफलिसी में जी रहे लाखों लोगों की कहानी है जिसे आज हार्डी जैसे कोच, साथी और हितैषी की आवश्यकता है।

प्रो एंड्रूज लिखते हैं मैं आश्चर्यचकित हूँ कि रामानुजन ने बिना किसी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से गणित की जो पराकाष्ठा पाई वो इनकी मदद से क्या क्या कमाल दिखा पाते।

इंग्लैंड में रामानुजन के प्रशिक्षक रहे लिटिलवुड तो एक कदम आगे जाकर लिखते है – रामानुजन 100 या 150 वर्ष पूर्व कितने महान होते? क्या होता अगर यूलर आज रामानुजन के संपर्क में होते।

रामानुजन को स्वयंभू कहने वाले महान गणितज्ञ प्रो हार्डी लिखते है की मैं गणितीय प्रतिभा के लिए खुद को 25, लिटिलवुड को 30, हिल्बर्ट को 80 और रामानुजन को 100 अंक देना चाहूँगा।

रामानुजन की ‘शोधप्रवृत्ति’

रामानुजन इसलिए महान नही हैं की उन्होंने विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेकर अपने लिए एक ऐसा स्थान बनाया जो विरले लोगों को ही प्राप्त होता है, हाइपरजियोमेट्रिक, सतत श्रेणी, मोकथीटा फंक्शन ,पार्टीशन नम्बर पर अपने समय से आगे जाकर खोज की। उनके जीवन का संदर्भ देकर यह कह सकते हैं कि शिक्षा और शोध के लिए परम्परागत डिग्री नहीं बल्कि एक शोधप्रवृति की आवश्यकता है, शोध ही वैज्ञानिकता को जीवंत करेगा।

हमें समूचे भारत में वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिए आज लाखों रामानुजन की जरूरत है जो हार्डी जैसे गुरु की तलाश में असमय दम तोड़ रहे हैं। रामानुजन का वास्तविक सम्मान तो यही होगा कि कोई भी प्रतिभा गुमनाम ना रहे इसको हम अपनी साझी जिम्मेदारी समझें।”

आज नेहरु के 1946 के कथन को सच करने का समय है जिससे भारत ज्ञान विज्ञान के सभी प्रतिमानों को सम्मान मिल सके। यही सच्चे अर्थों में 26 अप्रेल 1920 को परलोक गये इस महामानव के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 1920 में असामयिक मृत्यु की गोद में सोये इस कालजयी रामानुजन को मृत्यु के बाद पंडितों ने तो मुखाग्नि देने से केवल इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि समुद्री यात्रा से वापस लौटे रामानुजन ने प्रायश्चित के लिए रामेश्वरम की यात्रा नहीं की। आज भी सामाजिक विभेद बिखरा पड़ा है जिसे पाटने की जरूरत है, शोधपरक शिक्षा , वैज्ञानिक चिन्तन और समान शिक्षा देकर ही हम सच्चे मायने में देश की सेवा कर विश्वगुरु बन पाएंगे।

(लेखक परिचयः डॉ राजेश कुमार ठाकुर वर्तमान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , रोहिणी , सेक्टर 16 दिल्ली -110089 में अध्यापक हैं। 60 पुस्तकें , 500 गणितीय लेख, 400 से अधिक ब्लॉग , 10 रिसर्च पेपर प्रकाशित। 300 से अधिक विद्यालयों में शिक्षक प्रशिक्षण का अनुभव।)


यह लेख 26 अप्रेल 2020 को दो अलग अलग ऑनलाइन पोर्टल पर छपा 

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डॉ राजेश कुमार ठाकुर 

Tuesday, April 21, 2020

गणित शिक्षण की चुनौतियाँ - डॉ राजेश कुमार ठाकुर

ऑनलाइन पढ़े

गणित विषय को पढ़ाना हमेशा से एक चुनौती भरी एक डगर रही है। वर्तमान परिपेक्ष्य में जब गणित का अध्यापक बनना ही अपने आप में एक काँटों से भरा राह चुनने के समान हो गया है क्योंकि आज गणित की सुधि लेने वाला कोई नही है। यह जानते हुए भी की गणित कितना महत्वपूर्ण विषय है आज समाज, छात्र और सरकारें सब इसके प्रति उदासीन है।

आज कक्षा 11 में गणित पढने वाले छात्रों की संख्या घटती जा रही है और गणित शिक्षण एक दुरह कार्य है।आख़िर गणित के प्रति लोगों का सौतेला व्यवहार क्यों? इस सवाल पर फिर कभी चर्चा करेंगे। आज शिक्षण क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों पर ही ध्यान केन्द्रित करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

सरकारी उदासीनता

गणित के शिक्षक कक्षा में सरकारी उदासीनता का शिकार हैं। शिक्षा के जो कार्यक्रम या पाठ्यक्रम बनाये जाते है वो शिक्षकों के ऊपर पर थोपने की कवायद है जिससे पठन पाठन प्रभावित होता है। 1968 की शिक्षा नीति हो या 1986 की या NCF 2005 हो या आने वाली नई शिक्षा नीति-2019। सरकार ऐसे नीति बनाने में उच्च शिक्षण संस्थानों के लोगों को प्रश्रय देती है जिन्हें कक्षा की वास्तविक सच्चाई से कोई लेना देना नही है। इसमें शहरों और ग्रामीण इलाके के शिक्षकों को प्राथमिकता मिलनी आवश्यक है जो नीति बनाते समय इसमें परिवर्तन के बारे में सच्ची जानकारी दे सकें पर यह धरातल पर उतार पाना मुश्किल है। कक्षा में अध्यापकों को वही पढाना है जो सरकार चाहती है।

प्राथमिक स्तर पर ‘विषय अध्यापकों’ की कमीऐसा देखा गया है की प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों को सब विषय पढ़ाने का दायित्व होता है। ये तो जैक ऑफ़ आल ट्रेड वाली कहावत हो गयी। भला एक हिंदी का शिक्षक या सामाजिक अध्ययन में स्नातक अध्यापक गणित जैसे सूक्ष्म विषय पर कितना प्रकाश डाल पायेगा। यही से गणित के स्तर में गिरावट का जो सिलसिला चलता है वो आगे जाकर एक विशाल खाई के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इस स्तर पर एक ऐसे योग्य विषय शिक्षक की आवश्यकता है जो गणित की पढ़ाई को जड़ से ही मजबूत बनाने में सहयोग दे। इसके साथ ही साथ गणित के प्रति लोगों की उदासीनता को अपनी प्रतिभा से बदलने में योगदान दे।

कक्षा का वातावरण

भारत में आज काफी प्राइवेट स्कूलों के खुलने के बाद भी 80% से अधिक छात्र सरकारी विधालयों में पढ़ते हैं जहाँ छात्र और शिक्षक का अनुपात 40: 1 नही वल्कि 60: 1 या 80: 1 है। ऐसे में शिक्षकों द्वारा सही तरीके से संवाद संभव नही होता। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू है एक शिक्षक के पास ब्लैकबोर्ड और चाक के अलावा अधिक संसाधन नही होता ऐसे में – ग्राफ, रचना, त्रिविमीय आकृति को समझाना और पढाना काफी चुनौती भरा कार्य है। गणित की सही जानकारी छात्रों में अवलोकन के जरिये होता है। जब आप ब्लैकबोर्ड पर रचना करायेंगे, त्रिबिमीय आकृति समझायेंगे तो गणितीय ज्ञान की परिकल्पना एक कोरी कल्पना दिखेगी। इसके लिए आवश्यक है कक्षा में ग्राफ बोर्ड, कंप्यूटर के सॉफ्टवेर GEOGEBRA, ग्राफ के लिए ग्राफ या DOSMOS सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर पढ़ाया जाये।

ब्रिज कोर्स’ का न होना

प्राथमिक कक्षा से जब छात्र मिडिल स्कूल यानी कक्षा 6 में आता है तो शिक्षक और छात्र खुद को ठगा महसूस करते है क्योंकि लर्निंग गैप को भरने के लिए अब कोई ब्रिज कोर्स नही चलाया जाता। परीक्षा में कई छात्र अपने अंक के आधार पर 11वी कक्षा में गणित ले लेते है और यहां गणित का नया संसार देख परेशान हो जाते है। शिक्षक को यह समझ नही आता कि ऐसे समय मे वो प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की जानकारी साझा करें या उच्च माध्यमिक स्तर की।

भिन्न क्षमता वाले छात्रों का एक कक्षा में होना

समग्र शिक्षा एक अच्छी पहल है पर जब एक ही कक्षा में बेहद कमजोर , मध्यम और उच्च ज्ञान वाले छात्र मौजूद हों तो एक शिक्षक अपनी वास्तविक गणितीय क्षमता को भूल जाता है। दिल्ली सरकार ने कक्षा 6 से 8 तक यह प्रयोग अवश्य किया जिसमे छात्रों को कक्षा 6 से योग्यता के हिसाब से निष्ठा और प्रतिभा में बाँट दिया अब इसका नुकसान ये हुआ की सारे कमजोर छात्र एक जगह हो गए कक्षा का वातावरण विविधतापूण नहीं रह गया,जिसका लाभ भी बाकी बच्चों को मिलता था। वहीं दूसरी ओर कक्षा में डिस्लेक्सिया या अन्य शारीरिक अक्षमताओं वाले छात्र भी सामान्य छात्रों के साथ पढ़ते है जिस कारण एक शिक्षक का दायित्व सिर्फ कक्षा में पढाना नही बल्कि प्रत्येक छात्रों की जरूरत का ध्यान रखना है क्योंकि छात्रों की सुरक्षा भी एक मुद्दा है।

परीक्षा एक बाधा

परीक्षा छात्रों के समग्र मूल्याकन के लिए आवश्यक है पर आजकल यूनिट टेस्ट, क्लास टेस्ट, साप्ताहिक टेस्ट, सेमेस्टर और वार्षिक जैसे कई परीक्षाओं का अंबार लग गया है जिसमे शिक्षकों को सभी परीक्षा संवंधित रिकॉर्ड भी संग्रह करना होता है। इसके साथ ही कक्षा के पाठ्यक्रम को पूरा करना भी एक जिम्मेदारी होती है। परेशानी तब और बढ़ जाती है जब परीक्षा में पूछे गये प्रश्नों का स्तर छात्रों के हित को ध्यान में रखकर नही बनाया जाता है। प्रश्नपत्र बनाने वाले शिक्षक एक ही प्रश्न में कभी कभी अपनी सारी योग्यता इस कदर डाल देता है की छात्र प्रश्नों को हल करने में डरते है और इसका दुष्परिणाम ये होता है की गणित विषय में छात्र खुद को ठगा महसूस करते हैं।

शिक्षकों की उदासीनता

गणित के प्रति छात्र ही नही शिक्षकों में भी उदासीनता है। हमारा सिस्टम ही कुछ ऐसा है जिसमे शिक्षकों की योग्यता उसके कक्षा के पास बच्चों से निकाली जाती है। गणित एक गूढ़ विषय है परन्तु अपने गोपनीय रिपोर्ट में अपने रिजल्ट में पास छात्रों की सख्या दिखाने के चक्कर में सिर्फ उन्ही पाठ्य बिंदुओं पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है जो छात्रों को 33% अंक दिलाने में कारगर हो और इस चक्कर में गणित पढ़ाने के प्रति असली दायित्व से लोग मुंह मोड़ लेते हैं।

प्रशिक्षण की स्थिति

नये पाठ्यक्रम लाने के बाद शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे कक्षा में उचित ज्ञान संप्रेषित हो। पर मेरा निजी अनुभव कुछ अच्छा नहीं है। प्रशिक्षण देने वाले अधिकांश प्रशिक्षक एक खानापूर्ति जैसे कार्यों में लगे रहते हैं। उन्हें खुद प्रशिक्षण देने का उतना अनुभव नही होता या फिर तैयारी वाले पक्ष पर ज्यादा काम नहीं होता है इसके कारण प्रशिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कक्षा में पढाना एक दुरह कार्य है और इसको एक प्रशिक्षित ट्रेनर के द्वारा ही संपन्न किया जाना आवश्यक है , साथ ही सरकारों की यह ध्यान देने की आवश्यकता है की शिक्षक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं और पाठ्यक्रम बनाने में इनकी सहभागिता आवश्यक है। प्राथमिक स्तर पर जहाँ गणित का आधार बनता है वहां एक प्रशिक्षित अध्यापक जिन्हें विषय में जानकारी हो की नियुक्ति होनी चाहिए।

इसके साथ कक्षा को आधुनिक बनाने और गणितीय सॉफ्टवेयर के प्रयोग और अन्वेषी शिक्षा हेतु प्रयास करने पर जोर देने की आवश्यकता है। रिजल्ट बनाने के चक्कर में अनुदान अंक द्वारा छात्रों को पास करने मात्र से हम अपेक्षित परिणामों को हासिल नहीं कर सकेंगे।

गणित में नए नए तकनीक पर ध्यान देने की आवश्यकता है और साथ ही शिक्षको को एक आजादी देने की आवश्यकता है जिससे वे कक्षा में शिक्षण का कार्य समुचित रूप से कर सकें जिसमे सरकार, समाज और छात्रों की सहभागिता बेहद आवश्यक है। कक्षा का वातावरण ऐसा हो जहाँ सीखने की लालसा हो , पाठ्यपुस्तकें ऐसी हों जिसे देख छात्र-छात्राएं उत्साहित हों और शिक्षक ऐसे हों जो गणित की नीरसता में भी प्राण फूंक सकें। इस विषय के शिक्षण के जीवंत बना सकें और बच्चों के रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ सकें।

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(लेखक परिचयः डॉ राजेश कुमार ठाकुर वर्तमान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , रोहिणी , सेक्टर 16 दिल्ली -110089 में बतौर शिक्षक काम कर रहे हैं। 60 पुस्तकें , 500 गणितीय लेख, 400 से अधिक ब्लॉग व 10 रिसर्च पेपर प्रकाशित। 300 से अधिक विद्यालयों में शिक्षक-प्रशिक्षण का अनुभव। इस लेख के संदर्भ में आपके विचार और अनुभव क्या है, टिप्पणी लिखकर बताएं)

Tuesday, April 14, 2020

प्रकृति में गणित - डॉ राजेश कुमार ठाकुर






डॉ राजेश कुमार ठाकुर 


शून्य का सफरनामा





डॉ राजेश कुमार ठाकुर 

यह लेख 2009 या 2010 के करीब लिखी गयी थी जो विज्ञान प्रगति में प्रकाशित हुआ था , अंतिम पेज रह गया मिलने पर डालूँगा 

युक्लिड विभाजन प्रमेय (कक्षा 10)




प्रश्न :- युक्लिड विभाजन प्रमेय द्वारा 385 और 1001 का HCF (महत्तम समापवर्तक) निकालें

हल :- 1001 = 385 x 2 + 231

      385 = 231 x 1 + 154

      231 = 154 x 1 + 77

     154 = 77 x 2 + 0

अभ्यास प्रश्न 

क) 135 , 225  
ख ) 196, 3820
ग) 255, 867

डॉ राजेश कुमार ठाकुर 

Wednesday, April 8, 2020

वास्तविक संख्या भाग - 1- कक्षा 10

वास्तविक संख्या – भाग – 1

प्यारे बच्चों इस अध्याय में प्रयुक्त सूत्रों और प्रमेय पर एक नजर

·                                                                                        अंक गणित की आधारभूत प्रमेय

प्रत्येक भाज्य संख्या को अभाज्य संख्याओं के एक गुणनफ्ल के रूप में व्यक्त (गुणनखंडित) किया जा सकता था तथा यह गुणनखंड अभाज्य गुणनखंडों के आने वाले क्रम के बिना अद्वितीय होता है। 

अंकगणित की आधारभूत प्रमेय के अनुसार-

HCF (महत्तम समापवर्तक) = संख्याओं में प्रत्येक उभनिष्ठ अभाज्य गुणनखंड की सबसे छोटी घात का गुणनफल

LCM (लघुत्तम समापवर्तक) = संख्याओं से संबद्ध प्रत्येक अभाज्य गुणनखंड की सबसे बड़ी घात का गुणनफल

अत:,किसी दो घनात्मक पूर्णांक संख्याओं 

प्रश्न :- 140 को अभाज्य गुणनखंड के रूप में लिखें

हल :- 140=2×2×5×7

उत्तर :-26 का अभाज्य गुणनखंड 

91 का अभाज्य गुणनखंड 

अत:, HCF = उभयनिष्ठ अभाज्य गुणनखंड  = 

तथा LCM 

दोनों संख्याओं का गुणनफल 

तथा, HCF 

इस प्रकार ,दोनों संख्याओं का गुणनफल = LCM 

 

डॉ राजेश कुमार ठाकुर


Saturday, April 4, 2020

आख़िर गणित से इतना खौफ क्यों? - राजेश कुमार ठाकुर

आख़िर गणित से इतना खौफ क्यों?

यह पोस्ट Education Mirror ऑनलाइन ब्लॉग पर कुछ सुधार के साथ उपलब्ध है 

https://educationmirror.org/2020/04/05/fear-of-maths-and-way-forward/

गणित का नाम आते ही अधिकांश बच्चों के चेहरे से हवाई उड़ते हुए देखना कोई अजीबोगरीब घटना नही जान पड़ती. सामाजिक मान्यता का एक पहलू यह स्वयंसिद्ध सा प्रतीत होता है जब छात्रो के मन में गणित के प्रति नकारात्मकता को स्वीकार कर लिया जाता है तो गणित का अँधेरा अवश्य ही बच्चों को डराने का काम ही करेगा. आज गणित का खौफ किसी आततायी दानव जैसा प्रतीत होता है जिसके आतंक से सब डरे हुए हैं.

अब सवाल उठता है कि क्या गणित वास्तव में इतना भयभीत करने वाला विषय है या इसके अन्दर कुछ जीवंतता शेष है ?

गणित के सौन्दर्य की कल्पना वही कर सकता है जो इसमें रम गया हो. जिस तरह किसी क्रूर दानव को हराने के लिए देवताओं को भी तपस्या और सिद्धी के द्वारा अलग- अलग तरह के हथियार की आवश्यकता पड़ती थी उसी प्रकार गणित के आतंक को तभी परास्त किया जा सकता है जब आपके पास इसकी समझ और इससे लड़ने के लिए आपकी लगन के प्राप्त सुंदर हथियार मौजूद हो. भारतीयों की गणितीय प्रतिभा से विश्व सदा अचंभित रहा है. भारतीय वेदों, पुराणों में , पंडितों , कर्मकांडी ब्राह्मणों द्वारा भी आदि काल से इसकी महत्ता को समझा जाता रहा है, वेदों में गिनती की संख्या को 1012 जिसे परार्ध कहा गया का उल्लेख है, वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में रावण के द्वारा भेजे गये गुप्तचर शुक द्वारा राम की सेना बताने के लिए महौघ शब्द का प्रयोग किया गया जो 1060 के बराबर है. बौद्ध धर्म पर लिखी पुस्तक ललितविस्तार में महात्मा बुद्ध के शादी के समय गुरु अर्जुनदेव द्वारा उनकी गणित कौशल की प्रतिभा परखने का उल्लेख मिलता है जिसमे तल्लक्ष्णा (1053)का मिलना बुद्ध के गणितीय ज्ञान को बताने के लिए काफी है.

दाशमिक प्रणाली , दशमलव , शून्य , ऋणात्मक संख्या जैसी गणितीय ज्ञान से विश्वपटल में अपने ज्ञान का पताका फहराने वाले भारतीयों के मन में आज गणित के प्रति ऐसा अविश्वास क्यों ?

भारत में गणित की स्थिति कितनी डर पैदा करने वाली है इसका ज्ञान हमें “असर” या एनसीईआरटी के द्वारा हाल में किये शोधों से पता चलता है जो यह बताती है कि 60% से अधिक छात्र जिन्होंने कक्षा 5 तक की पढाई की है उन्हें हासिल वाले घटा, एक अंक द्वारा भाग , संख्या निरूपण में परिपक्वता नही है. सीबीएसई के अनुसार कक्षा 10 पास करने वाले 21% छात्र ही 11कक्षा में गणित को एक विषय के रूप में लेते हैं.

आख़िर गणित विषय से इतनी नफरत छात्रों में क्यों व्याप्त है ? पिछले 15 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण , विगत 5 वर्षों में देश के कई हिस्सों में गणित शिक्षकों के प्रशिक्षण और देश की कई विद्यालयों, विश्वविधालय में छात्रों के साथ अपने अनुभव साझा करने और उन्हें सुनने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पंहुचा हूँ की इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं.

1.       सिस्टम सबसे बड़ा जिम्मेदार :- यदि आप किसी छात्र को किसी कार्टून करैक्टर – छोटा भीम, डोरीमोन, मोटू पतलू दिखाकर उनसे पहचानने को कहें तो वो झट से पहचान जायेंगे , यही हाल किसी अभिनेता, राजनेता के लिए भी सही बैठेगी पर अगर किसी गणितग्य के चित्र दिखा उनसे परिचय लेना चाहे तो परिणाम इसके विपरीत होगा. मतलब साफ़ है जबतक आप गणित को ऐसे विषय के रूप में पेश नही करेंगे जहाँ बच्चे गणित के किसी करैक्टर के साथ खुद को जोड़ पायें उनके बीच अपनत्व का भाव नही पनपेगा. सरकार का यह प्रयास कभी नही रहा की किताबें ऐसी हो जिसमे छात्र आनंद का अनुभव कर सके या ऐसी रोचकता के साथ खुद को जोड़ वैसा बनने की प्रेरणा ले सके. अगर पुस्तक में किसी गणितग्य से सम्बंधित कहानी हो जो रोचकता से भरपूर हो , कविताये हो जो गणित के महत्व को समझाएं, पहेली हो जिससे जीवन्तता का अनुभव हो , कार्टून करैक्टर में गणितज्ञों को पेश करने की परंपरा डाली जाये तो गणित एक जीवंत विषय बन जायेगा. आज गणित की पाठ्यक्रम को सवालों का पुलिंदा बनाकर पेश किया जाता है जिसमे कोई रोचकता नही रहती है. पुराने समय में गणित के जितने ग्रन्थ लिखे गये चाहे वो आर्यभट्टीय हो या लीलावती सब पद्यात्मक शैली में लिखी गयी जिससे रोचकता बनी रहे. आज सरकारी सिस्टम में गणित को एक बोझिल विषय बना दिया गया है जिसमे गणित की वास्तविक उपयोगिता का स्थान गौण है.

2.       प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी :- मेरा आशय सिर्फ बीएड या एमएससी जैसी डिग्री प्राप्त शिक्षकों से नही है. आज ऐसे शिक्षकों की जो गणित को रोचक बना सके, बच्चों को गणित के अथाह सागर में छुपे मोती दिखा सके, उन्हें आत्म-साक्षात्कार करा सके का सर्वदा अभाव है. रिजल्ट लाने की आपाधापी में आज सवाल हल करने के जो तरीके बताये जाते है वो समस्या को गहराई से समझने और उसे हल करने के नए तरीके खोजने के लिए प्रेरित नहीं करते बल्कि उनका ज्ञान संकुचित कर सिर्फ अंक लाने पर केन्द्रित कर देंते हैं. आज हमें हार्डी जैसे शिक्षकों की जरूरत है जो रामानुजन को खोज उसकी प्रतिभा निखारने में खुद को गौरवान्वित महसूस करे ना की सिलेबस ख़त्म करने के उलझनों में गणित की रोचकता से समझौता कर ले.

3.       सवालों की आजादी नही :- वर्तमान परिदृश्य में शिक्षकों ने अपने ज्ञान में कोई बढ़ोतरी नही की और की भी तो सिर्फ अपने लिए इसका फायदा छात्रों तक ठीक तरह पहुचे ऐसा हुआ नही. छात्रों को कक्षा में सोचने के लिए प्रेरित नही किया जाता और ना ही उन्हें सवालों की आजादी है. शून्य के बारे में बताते तो हैं पर शून्य किसने खोजा नही बताते, दो ऋणात्मक संख्या का गुणा धनात्मक होता है पर क्यों नही पता. गणित की एतिहासिक पृष्ठभूमि से दर्शन कराने का कोई प्रयास या ऐसा सवाल जिसमे शिक्षक उलझ जाये पसंद नही किया जाता. अपनी ज्ञान को थोपने का सिलसिला भी गणित की दुर्गति का एक कारण है.

4.       गणित के कैरिएर पर प्रश्नचिन्ह:-  गणित पढकर क्या एक शिक्षक बनना है या इसके और कई आयाम है यह बताने का काम नही किया जाता. गणित के क्षेत्र से सम्बंधित बैंकिंग, इंजीनियरिंग या शिक्षण को छोड़ अन्य करियर की जानकारी 90% से अधिक छात्रों को नही है और जब भविष्य का प्रश्न हो और यह अधर में लटका हो तो ऐसे विषय से कोई क्यों प्यार करेगा

5.       शोध की कमी :- 2014 में गणित के फील्ड मेडल पाने वाले मंजुल भार्गव ने लिखा की भारत में टीआईएफआर, ISI, IISc जैसे संस्थानों को छोड़ किसी विश्वविधालय में गणित में शोध की जगह नही दिखती. आज गणित का क्षेत्र कितना व्यापक है. अन्तरिक्ष विज्ञान, जीव विज्ञान , सांख्यिकी , मेडिकल , सडक निर्माण से लेकर हर तरह के अनुसन्धान में इसका उपयोग हो रहा है जिसके बारे में हमारे यहाँ कोई ध्यान नही दिया जाता. यदि कोई छात्र पढाई में अच्छा है तो वह इंजिनियर बन सिर्फ अच्छे नौकरी के तलाश में है क्योंकि एक तो शोध की कमी है और एक शोधार्थी का सामाजिक सम्मान एक व्यापारी या इंजिनियर छात्र से कम है.


सिर्फ शिक्षा नीति में गणित पर बड़ी बड़ी बातकर हम गणित का भला नही कर सकते. इसके लिए हमें प्रयोगशील और शोधपरक शिक्षा पर जोर देने की जरूरत है. सामाजिक सोच को बदलने की जरूरत है की गणित का क्षेत्र कितना व्यापक है और इसकी उपयोगिता का आत्म अवलोकन करने के लिए शिक्षकों को एक प्रशिक्षण की आवश्यकता है जो छात्रों को गणित की व्यापकता से साक्षात्कार कराये , सरकारी एजेंसी को सिर्फ 100% परिणाम लाकर पीठ थपथपाने या बच्चों के लिए गणित का आसान पाठ्यक्रम लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेने की सोच से बाहर निकलकर गणित के प्रति इमानदार होने की जरूरत है जिससे छात्र इसकी गहनता, रोचकता और उपयोगिता को समझे और गणित का भला हो तभी डर निकलेगा.

 

डॉ राजेश कुमार ठाकुर

अध्यापक , राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , रोहिणी , सेक्टर 16 दिल्ली -110089

60 पुस्तक , 500 गणितीय लेख, 400 से अधिक ब्लॉग , 10 रिसर्च पेपर प्रकाशित , 300 से अधिक विद्यालयों में शिक्षक प्रशिक्षण

रामानुजन क्लब गुजरात के सचिव

 

 

 


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